अनुकरणीय कार्य:- आनंदम सहयोगी विजय मेवाड़ा द्वारा

प्रेषक का नाम :- Arvind sharma
स्‍थल :- Indore

सत्य घटना पर आधारित मेरा निजी अनुभव* ------->मदद करने से होती है आनंद की अनुभूति

आज 10-10-2017दोपहर आनंद विभाग की वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग अटेंड करने कलेक्टरऑफिस जाते समय रास्ते पर एक विद्यार्थी दिखाई दिया जो कही जाने के लिए किसी परिवहन का इंतज़ार कर रहा था। गांव से शहर जाने के लिए किसी सुनिश्चित परिवहन के न होने से बहुत से लोगों को शहर आने-जाने में दिक्कतें आती हैं। वो काफी देर से वहां खड़ा था फिर थक कर सड़क किनारे बैठ गया और बैठे बैठे लिफ्ट मांग रहा था। जाने कितने लोग वहां से गुजरे संवेदनहीन लोगो के पास अब शायद किसी की मदद करने का वक़्त ही कहाँ बचा हैं।लोग उसे अनदेखा कर वहां से गुजरते रहें। मुझे देखकर उसने वहीं बैठे-बैठे अनमने मन से हाथ हिलाकर रुकने का इशारा किया। मेरे दिमाग में यही बात चल रही थी की 2:00 मीटिंग अटेंड करनी है,लेकिन दिल में मदद करने की भावना उमड़ रही थी, आखिरकार दिल की आवाज़ ने दिमाग की आवाज को दबा दिया। मैने गाड़ी रोक दी उसके चहरे पर मुस्कान छा गई उन्हें कतई अंदाज़ा नही था कि मैं गाड़ी रोक दूंगा। मैंने पूछा कहा जाना है उसने इशारा किया।मैंने कहा बैठ जाओ ,वो बिना सहारे के खड़ा नहीं हो पा रहा था मैंने मोटर साइकिल साइड में खड़ी कर उसे सहारा दिया और गाड़ी पर बैठाया,उसका एक हाथ और एक पैर अविकसित दिखाई दे रहा था।मैंने फिर पूछा भाई कहाँ छोड़ दूँ, उसने मुह से कुछ नहीं कहा,मुझे उसका परिचय पत्र दिखाया उसका नाम रामु कुमार वर्मा था जो शा मूक बघिर कॉलेज सुल्तानपुर का छात्र था,अंतरात्मा से आवाज आई अब चाहे vc में विलम्ब से पहुंचे पर इस दिव्यांग भाई को उसकी मंज़िल तक छोड़कर आऊंगा वह बालक 8 कि मि दूर इंदौर देवास बाईपास स्थित मालवा कॉलेज पर उतरा मैंने उसकी मदद स्वरुप 100 रु दिए परंतु उसने लेने से इंकार कर दिया, उसने मुझे sign language thumb दिखाकर धन्यवाद दिया।मैंने उसे मुन्ना भाई MBBS की तरह जादू की झप्पी दी।उसने मेरे दोनों हाथ पकड़कर मेरा अभिवादन किया,मेरे मन में मानो आनंद का झरना बहने लगा।प्रत्येक व्यक्ति इस जीवन में सुख ही तो प्राप्त करना चाहता है, चंद लम्हों का आनंद प्राप्त करने के लिए जाने कितने जतन करता है। हम  दिन रात मेहनत करके पैसा कमाते है फिर पैसा खर्च करके आंनद प्राप्त करना चाहते है, जबकि प्रतिदिन हमारे सामने से आंनद के क्षण गुजरते रहते है और हम उन्हें नज़रअंदाज कर देते है। मेरी गुजारिश हैं जब भी आपको रास्ते पर पैदल चलते हुए बुज़ुर्ग या स्कूल जाते हुए बच्चे दिखाई दें तो उन्हें उनकी मंज़िल तक पहुंचाने में सहायता जरूर करें। किसी जरूरतमंद  की मदद करके जो आंनद प्राप्त होता है वो कभी पैसा खर्च करके भी खरीदा नही जा सकता। असहाय लोगों की मदद करने से जो आनंद मिलता है वो अद्वितीय होता है।


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