दुआओं का घर की सफलता पर एक कवि की रचना

प्रेषक का नाम :- कृष्ण गोप
स्‍थल :- Mandla
14 Mar, 2017

ये मंडला है यारों हमारा शहर नदी नर्मदा का किनारा शहर कलेक्ट्रेट से लग के सजा एक हाल बना इसमें देखो 'दुआओं का घर' लिखी है इबारत सजाती दीवार चमकती है तहरीर सोने सी यार लिखा है 'जो सामान आपके पास बेकार पड़ा है यहां छोड़ जाईये और जो आपकी जरूरत का सामान है यहां से ले जाईये ! गजब की है देखो ये ऊंची पहल जहां खुद ब खुद आएं गुरबत के हल यही एक संदेश है सबको आज कि सोचे सभी की ये सारा समाज सजा दो उन चीजों से ये सारे हैंगर पड़ीं घर में जो भी जरूरत से ऊपर इन्हें पा के खुश होंगे वो सारे जन तरसते हैं इनके लिये जिनके मन उन्हें अब रहे ना न होने का दुख जो दे वो भी पा लेगा देने का सुख। बनी है गवाही ये पावन दिवाल कोई ले के आए है कपड़े पुराने कोई कोट कंबल या चादर ले आया जो ठिठुरे था जाड़े में स्वेटर वो पाया किसी को लिहाफ एक मखमल का भाया वो मां जिसने पा ली यहां एक रजाई वो भर नैना बच्चों को सुख से सुलाई कितनी किताबों से घर भर रहा है जो पाया वो ले जा के घर पढ़ रहा है । अपनी तरह का दिखा भाई चारा न मेरा न तेरा ये सब है हमारा चलो सबके दुख आज बाटेंगे हम हां सुख अपने भी सबमें बांटेंगे हम। दुआ देगा बस्ती को ये घर अनोखा सच्ची इबादत का ये दर अनोखा ये मंदिर है मस्जिद है गिरजा गुरद्वारा 'दुआओं का घर' रब का घर सबसे प्यारा ।


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