क्लब अध्यक्ष नेे विक्षिप्त को कपड़े पहनाये”’ आत्मा की पुकार सुन कर स्वयं की रोटी खिलाने में मिला “”आत्म संतोष””

प्रेषक का नाम :- विष्णु कुमार सिंगौर मंड़ल संयोजक जनजातिय कार्य विभाग /आनंदम सहयोगी मंड़ला
स्‍थल :- Mandla
08 Jun, 2018

’ आत्मा की पुकार सुन कर स्वयं की रोटी खिलाने में मिला “”आत्म संतोष”” हमारे आसपास बहुत सी स्थिति ऐसी निर्मित होती हैं जिनको देखने से ही आंतरिक पीड़ा तो होती ही है साथ ही मस्तिष्क काम न करके केवल हृदय से निकलने वाले निर्देशों का पालन करना पड़ता है। शरीर को निर्देशन मस्तिष्क से नहीं अपितु हृदय/आत्मा से प्राप्त होता है, और तब सम्‍पन्‍न होते है मानवीय/ कार्य। रामचरितमानस में भी गोस्वामीजी ने लिखा है “परहित सरसि धरम नहीं भाई । परपीड़ा सम नहींअधमाई।। रोज़ की तरह बीते दिन भी आनंदम ( दुआओं का घर ) मंड़ला में काम कर रहे थे कि सामने से एक अपरिचित विक्षिप्त बिलकुल निर्वस्त्र अवस्था में ……दुनिया की परवाह किये बिना……..नवतपा की चिलचिलाती धूप से बेपरवाह सड़क पर सामने से निकल रहा था। तभी एक भले व्यक्ति ने रुक कर उसके लिये कपड़े देने का आग्रह किया।कुछ पल के विचार से समझ में आ गया कि उसके शरीर में बल नहीं है कमजोरी के कारण अंग ठीक से काम नहीं कर रहे हैं और मुहँ से आवाज नहीं निकलती बल्कि दूसरों के निर्देशों का पालन करता है। इतने में आनंदम मुसाफिर सेवा क्लब अध्यक्ष श्री अमित बैरागी दौड़े आये और उस विक्षिप्त को कुर्ता /लोवर पहनाया। लोवर/कुर्ता भी इस उदेश्य से कि पहनने में उसे कठिनाई नहीं, आसानी हो । तदोपरांत भोजन/ खाने के विषय में इशारों में ही जताया कि उसने भोजन नहीं किया है और खाने के लिये स्वीकारोक्ति अभिव्यक्त की । भोजन की बात से मुझे ध्यान आया कि मैने भी नास्ता नहीं किया है मेरा टिफिन भी जस का तस बैग में ही है, टिफिन में रखी चार रोटियों में से दो रोटियाँ उसकी तरफ बढ़ा दी। कुछ देर आनंदम् की छाया में ही विश्राम करने के बाद वह अगले पड़ाव के लिये निकल गया।…………


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