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प्रतियोगी पुस्तकें हमें सफल बनाने के.बाद, दूसरों को सफलता दिलायाँगीं। दूसरों की सफलता में सहायक होकर आनंद की अनुभूति मैनें किया।

प्रेषक का नाम :- विष्णु कुमार सिंगौर मंडल संयोजक/आनंदम सहयोगी मंडला
स्‍थल :- Mandla
17 Aug, 2017

हेमलता मांडवे निवासी बिछिया,सरस्वती मरावी निवासी ग्राम बहँगा,और इनके.तीन अन्य साथी छात्रायें हैं। बिछिया जिला मुख्यालय से.50 किमी. दूर हैं जहाँ पर स्नातकोत्तर महाविद्यालय नही है।सभी छात्राऐं आर्थिक रूप से पिछड़े परिवार से हैं। छात्राँए किराये.से मकान लेकर, राजनीति शास्त्र में एम.ए. की शिक्षा प्राप्त कर रहीं हैं। ये छात्राएँ काँलेज से अपने कमरे की जा.रही थीं। आनंदम ( दुआओं का घर ) के सामने कौतुहल और जिज्ञासा पूर्ण भाव से देख रहीं थीं। मुझे समझ में आ चुका था।कि ये छात्राओं इस विषय में बताना होगा। सभी छात्राओं को आनंदम ( दुआओं का घर ) के विषय में बताया। जैसे ही छात्राओं की नजर सक्सीड,,प्रतियोगिता निर्देशिका और प्रतियोगिता दर्पण पर उनके मुहँ से निकला।“” कि इनकी हमें जरूरत है”” प्रतियोगी किताबें पाकर छात्राएँ अत्यंत ही भावुक थीं और खुश भी। मुझे भी महसूश हुआ, कि इन किताबों के बदले कबाड़ी से वो आनंद नहीं मिलती जितनी इनको देने से। अनोखा यह लेना-देना, जँहा लेने वाला भी आनंद में देने वाला भी आनंद में।


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